छबीला रंगबाज़ का शहर - हिंदी PDF | Chhabila Rangbaaz ka Shahar By Pravin Kumar In Hindi PDF Free Download

 



छबीला रंगबाज़ का शहर - हिंदी PDF | Chhabila Rangbaaz ka Shahar By Pravin Kumar In Hindi PDF Free Download

पुस्तक : छबीला रंगबाज़ का शहर 


लेखक : प्रवीण कुमार 


पुस्तक की भाषा : हिंदी 


पृष्ठ : 147


PDF साइज : 3.40 MB







Chhabila Rangbaaz ka Shahar In Hindi PDF Free Download 




Shahar jag chuka tha. isaka matalab tha ki roj kee tarah vah sooryoday se ek ghanta aage tha. subah uthane ke baad jaise pratyek manushy ke phresh hone ko ham naisargik kriya ke naam se jaanate hain, theek usee prakriya se shahar bhee gujar raha tha, shaant aur manthar gati se. koode hatae ja rahe the, sadakon-phutapaayon kee safaee ho rahee thee, daatun bechanevaale aur mochee log apanee boree vidyaakar dukaan phailaane se pahale phutapaath par ho rahee safaee ko use... maaf karen... vijay prasaad chaayavaala doodh aur chaay ko sadak se uthatee dhool se bachaane kee bharasak koshish kar raha tha. 

Kal vijay ne mochhua ko phree mein chaay nahin dee thee. pre ummeed se dekh rahe the jaise ki aajakal sivil sosaitee sansad ko dekhana chaahatee hai. bijeeyaatikriya mein mochhua aaj chaay kee dukaan par kuchh zyaada hee dhool uda raha tha. ekadam laaparavaaha yahaan ek gupt sangharsh chal raha tha. nyootan ke teesare niyam ke anuroop hee donon kee aankhen chaar ho chukee theen, donaalee donon or se tan chukee thee, visphot kabhee bhee ho sakata tha. matalab shahar apanee dyootee ke lie sachamuch mein jag chuka tha.








Chhabila Rangbaaz ka Shahar In Hindi पुस्तक का विवरण :



शहर जग चुका था। इसका मतलब था कि रोज की तरह वह सूर्योदय से एक घंटा आगे था। सुबह उठने के बाद जैसे प्रत्येक मनुष्य के 'फ्रेश' होने को हम नैसर्गिक क्रिया के नाम से जानते हैं, ठीक उसी प्रक्रिया से शहर भी गुजर रहा था, शान्त और मंथर गति से। कूड़े हटाए जा रहे थे, सड़कों-फुटपायों की सफ़ाई हो रही थी, दातुन बेचनेवाले और मोची लोग अपनी बोरी विद्याकर दुकान फैलाने से पहले फुटपाथ पर हो रही सफ़ाई को उसी उम्मीद से देख रहे थे जैसे कि आजकल 'सिविल सोसाइटी' संसद को देखना चाहती है।

बिजईया... माफ़ करें... विजय प्रसाद चायवाला दूध और चाय को सड़क से उठती धूल से बचाने की भरसक कोशिश कर रहा था। कल विजय ने मोछुआ को फ्री में चाय नहीं दी थी। प्रतिक्रिया में मोछुआ आज चाय की दुकान पर कुछ ज़्यादा ही धूल उड़ा रहा था। एकदम लापरवाहा यहाँ एक गुप्त संघर्ष चल रहा था। न्यूटन के तीसरे नियम के अनुरूप ही दोनों की आँखें चार हो चुकी थीं, दोनाली दोनों ओर से तन चुकी थी, विस्फोट कभी भी हो सकता था। मतलब शहर अपनी 'ड्यूटी' के लिए सचमुच में जग चुका था।



तो स्टेशन के पास यह सब हो रहा था और उधर पूरव का आकाश सूरज से गुत्थमगुत्थी करके लाल होता जा रहा था। विजय, मोछुआ, सूरज और आकाश मिलकर आज का कुछ 'क्लाईमेक्स' बनाते इससे पहले ही स्टेशन पर ट्रेन आकर खड़ी हो गयी। जब से कोयला इंजन खत्म हुआ है तब से स्टेशन पर और दूर पटरियों पर मरने-कटने वालों की संख्या बढ़ गयी है। साला पता ही नहीं चलता कि ट्रेन कब आयी गयी? बशर्ते वह हॉर्न न बजाये। 


हालांकि हॉर्न कभी-कभी बज भी जाता है तो कभी-कभी लोगों की जान भी बच जाती है। तो स्टेशन पर ट्रेन आकर शान्त हाथी की तरह खड़ी हो गयी। प्लेटफार्म नम्बर दो रतजगा करके अभी-अभी ऊँघ रहा था। ट्रेन कब आयी इसका भान नहीं हुआ। चाय लेकर दौड़ने वाले छोकरों में उत्साह नहीं था, वे भी ऊँघ रहे थे। इसका मतलब था कि यह एक्सप्रेस गाड़ी है जो वेमेल समय में आयी है, इस हाथी का कोई स्वागतकार नहीं। सोलह डब्बों वाली इस ट्रेन ने अपने अनुपात से बहुत ही कम केवल एक यात्री को बाहर उगला।

स्टेशन पर सोये हुए लोगों की फ़ौज उस यात्री को किसी मुर्दाघर का आभास करा रही थी। ट्रेन से उतरने वाला यह यात्री असमंजस में था—थोड़ी देर तका फिर सकुचाते हुए वह सोये मुर्दों को एक-एक कर लाँघता गया। एक-दो दस बीस-पच्चीस, हर देह को लांघते हुए झिझक या शर्म जैसी कोई चीज उसे लगातार परेशान कर रही थी। पूरा वातावरण शान्त और निर्लिप्त था पर यात्री के पैर कॉप रहे थे। प्लेटफार्म पर उस भद्र व्यक्ति के सिवाय कोई भी चीज़ हरकत में न थी। स्टेशन मास्टर के केबिन के सामने सोई


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Description of the book In English :



The city had woken up. This meant that as usual he was an hour ahead of sunrise. After waking up in the morning, as we know by the name of natural action of every human being 'fresh', the city was also passing through the same process, at a calm and slow pace. Garbage was being removed, the streets and pavements were being cleaned, the tooth sellers and cobblers before spreading their sacks were looking at the pavement being cleaned with the same hope as the 'civil society' wanted to see the Parliament these days. Is.

Bijaiya... Sorr... Vijay Prasad Chaiwala was trying his best to save the milk and tea from the dust rising from the road. Yesterday Vijay did not give free tea to Mochua. In response, the mochua was blowing too much dust at the tea stall today. There was a secret strugygle going on here completely careless. According to Newton's third law, both of their eyes had become four, the two sides were stretched from both sides, the explosion could have happened at any time. Meaning the city had really woken up to its 'duty'.










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