चरित्रहीन - हिंदी PDF | Charitraheen By Sharatchandr Chatopadhyay In Hindi PDF Free Download





चरित्रहीन -  हिंदी  PDF | Charitraheen By Sharatchandr Chatopadhyay  In Hindi PDF Free Download


पुस्तक : चरित्रहीन 


लेखक : शरतचंद्र चटोपाध्याय 


पुस्तक की भाषा : हिंदी 


पृष्ठ : 260 


PDF साइज :  3.11 MB





Charitraheen Novel In Hindi PDF Free Download 


Ek baar sharat kee any pustakon ke saath unakee charitraheen kee paandulipi, jo lagabhag paanch sau prshthon kee thee, jal gaee. isase hataash ve avashy hee bahut hue, parantu niraash nahin. apane asaadhaaran parishram se use punah likhane se samarth hue. prastut rachana unakee badee lagan aur saadhana se nirmit vahee kalaakrti hai. sharat baaboo ne apanee is amar krti ke sambandh mein apane kaavy-marmagy mitr pramay baaboo ko likha tha, "keval naam aur praarambh ko dekhakar hee charitraheen mat samajh baithana. main neetishaastr ka sachcha vidyaarthee hoon. 


Neetishaastr samajhata hoon. kuchh bhee ho, raay dena, lekin raay dete samay mere gambheer uddeshy ko yaad rakhana. main jo ulata-seedha kalam kee nok par aaya, nahin likhata. aarambh mein hee uddeshy lekar chalata hoon. vah ghatana chakr mein badala nahin jaata." apane doosare patr mein sharat baaboo prastut pustak ke sambandh mein likhate hain "shaayad paandulipi padhakar ve (pramath) kuchh dar gae hain. unhonne saavitree ko naukaraanee ke roop mein hee dekha hai.






Charitraheen In Hindi पुस्तक का विवरण :


एक बार शरत की अन्य पुस्तकों के साथ उनकी चरित्रहीन की पांडुलिपि, जो लगभग पाँच सौ पृष्ठों की थी, जल गई। इससे हताश वे अवश्य ही बहुत हुए, परंतु निराश नहीं। अपने असाधारण परिश्रम से उसे पुनः लिखने से समर्थ हुए। प्रस्तुत रचना उनकी बड़ी लगन और साधना से निर्मित वही कलाकृति है। शरत बाबू ने अपनी इस अमर कृति के संबंध में अपने काव्य-मर्मज्ञ मित्र प्रमय बाबू को लिखा था, "केवल नाम और प्रारंभ को देखकर ही चरित्रहीन मत समझ बैठना।


 मैं नीतिशास्त्र का सच्चा विद्यार्थी हूँ। नीतिशास्त्र समझता हूँ। कुछ भी हो, राय देना, लेकिन राय देते समय मेरे गंभीर उद्देश्य को याद रखना। मैं जो उलटा-सीधा कलम की नोक पर आया, नहीं लिखता। आरंभ में ही उद्देश्य लेकर चलता हूँ। वह घटना चक्र में बदला नहीं जाता।" अपने दूसरे पत्र में शरत् बाबू प्रस्तुत पुस्तक के संबंध में लिखते हैं "शायद पांडुलिपि पढ़कर वे (प्रमथ) कुछ डर गए हैं। उन्होंने सावित्री को नौकरानी के रूप में ही देखा है।



 यदि आँख होती और कहानी के चरित्र कहाँ, किस तरह शेष होते हैं, किस कोयले की खान से कितना अमूल्य हीरा निकल सकता है, समझते तो इतनी आसानी से उसे छोड़ना न चाहते। अंत में हो सकता है कि एक दिन पश्चात्ताप करें कि हाथ में आने पर भी कैसा रन उन्होंने त्याग दिया! किंतु वे लोग स्वयं ही कह रहे हैं, 'चरित्रहीन का अंतिम अंश रवि बाबू से भी बहुत अच्छा हुआ है, (शैली और चरित्र चित्रण में) पर उन्हें डर है कि अंतिम अंश को कहीं मैं बिगाड़ न दूँ।



उन्होंने इस बात को नहीं सोचा, जो व्यक्ति जान-बूझकर मैस की एक नौकरानी को प्रारंभ में ही खींचकर लोगों के सामने उपस्थित करने की हिम्मत करता है, वह अपनी क्षमताओं को समझकर ही ऐसा करता है। यदि इतना भी मैं न जानूँगा तो झूठ ही तुम लोगों की गुरुआई करता रहा।" बंगला के सफल लेखक श्री रमेंद्र बनर्जी अब कई वर्ष से हिंदी में लिख रहे हैं। आशा है, उनका प्रस्तुत अनुवाद पाठकों को विशेष रुचिकर होगा।


पश्चिम हिंदुस्तान के एक बड़े नगर में जाड़े की ऋतु लगभग आ पहुँची थी। रामकृष्ण परमहंस के एक नए शिष्य को किसी एक शुभ कार्य की भाषण-सभा में उपेंद्र को सभापति बनाया जाए, और उस पद की मर्यादा के अनुकूल जो कुछ कर्तव्य है, उनका भी अनुष्ठान पूरा करा लिया जाए, इसी प्रस्ताव को लेकर एक दिन सवेरे कॉलेज के विद्यार्थियों का दल उपेंद्र के पास पहुँच गया।



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Description of the book In Hindi :


Once the manuscript of his characterless, which was about five hundred pages, got burnt along with the other books of Sharat. They were certainly disappointed by this, but not disappointed. His extraordinary diligence enabled him to rewrite it. Presented composition is the same artwork created by his great dedication and practice. In relation to this immortal work, Sarat Babu wrote to his poet-penetrating friend Pramay Babu, "Don't be considered characterless just by looking at the name and the beginning.


I am a true student of ethics. I understand ethics. Whatever it is, give your opinion, but remember my sincere purpose when giving your opinion. I do not write those who came straight to the tip of the pen. In the beginning, let me go with a purpose. That event doesn't change in cycles." In his second letter, Sarat Babu writes about the book presented, "Perhaps he (Pramath) got a little scared after reading the manuscript. He has seen Savitri only as a maid.





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