जातक कथाएँ - श्री चन्द्रिका प्रसाद मिश्र हिंदी PDF | Jatak Kathye By Shri Chandrika Prasad Mishr PDF Download Hindi Book




Jatak Kathye By Shri Chandrika Prasad Mishr PDF


पुस्तक / book : जातक कथाएँ 


लेखक / author : श्री चन्द्रिका प्रसाद मिश्र 


पुस्तक की भाषा / language : हिंदी 


पृष्ठ / page : 143


PDF साइज / size : 6 MB 



 

Jatak Kathye By Shri Chandrika Prasad Mishr In Hindi PDF Download 

Jātak kā artha hai janma-vṛuttāanta. mūl jātak mean 550 kathāe sangra hai jinamean se pratyek unake kisī pūrva janma se sambandhit haian। in mean kuchh mean punarukti bhī hai arthāt ek hī kathā ek se adhik r bhī kahī gaī hai। is chhoṭī-sī pustikā mean sabhī kathāoan ko de nā to sambhav n thā aur unamean se kyā lenā aur kyā chhoḍanā yah m saral n thā। fir bhī maianne is kaṭhin kārya ko karane kā has kiyā hai aur chunī huī 25 kathāoan ko lekar pāṭhakoan ke sammukh pasthit ho rahā hū.

Jātak kathāoan kā vāstavik lekhak kaun hai, yah kah sakanā kaṭi hai. aisā pratīt hotā hai ki bhagavān buddha ke parinirvāṇ ke 500 v ke bhītar ye kathāe likhī gaī haian. lekhak kā uddeshya jan sādhāraṇ bhagavān ke upadeshoan kā prachār karanā hai. bhagavān buddha ke prati janat kī shraddhā kā lābh uṭhāne ke uddeshya se unhīan ke shrīmukh se kathāoan k varṇan karāyā gayā hai। purāṇakāroan ne bhī devatāoan ke nām par grantha kī rachanā kī hai. goswāmī tulasīdās ne rāmāyaṇ kī kathā bhagavān shankar ke mukh se kahalāī hai.




Jatak kathye In Hindi PDF पुस्तक का विवरण : 

जातक का अर्थ है जन्म-वृत्तांत । मूल जातक में ५५० कथाएँ संग्र है जिनमें से प्रत्येक उनके किसी पूर्व जन्म से सम्बन्धित हैं। इन में कुछ में पुनरुक्ति भी है अर्थात् एक ही कथा एक से अधिक र भी कही गई है। इस छोटी-सी पुस्तिका में सभी कथाओं को दे ना तो सम्भव न था और उनमें से क्या लेना और क्या छोड़ना यह म सरल न था। फिर भी मैंने इस कठिन कार्य को करने का हस किया है और चुनी हुई २५ कथाओं को लेकर पाठकों के सम्मुख पस्थित हो रहा हूँ ।


कथाओं का रूप मैंने मूल के अनुसार ही रखा है परन्तु भाषा मेरी अपनी है। प्रत्येक कथा तीन भागों में विभक्त है

(१) गाथा: कथा के आरम्भ में एक पद्य होता है जो उस कथा को सार रूप में पाठक के सामने रख देता है अथवा उसका संदर्भ देता है। कुछ कथाओं के अन्तर्गत कई गाथाएँ और भी आ जाती हैं । भूल गाथाएँ पाली में है जो साधारण पाठकों के लिये दुर्बोध ही होनी अतएव मैंने केवल उनका हिन्दी भाषान्तर मात्र ही देकर संतोष किया है ।

(२) वर्तमान कथा : प्रायः इसका सम्बन्ध भगवान बुद्ध के समय की किसी घटना विशेष से होता है जिसकी चर्चा बिहार में भिक्षु समुदाय में होती है और जिसके आधार पर भगवान पूर्व जन्म का वृत्तांत सुनाते हैं। इन घटनाओं में हमें तत्कालीन राजपरि वारों, प्रतिष्ठित व्यक्तियों, भिक्षुओं, बुद्धभक्तों तथा साधारण जनों का उल्लेख समान रूप से मिलता है ।


(३) अतीत कथा : वास्तविक जन्म कथा होती है जिसमें वर्तमा कथा की किसी बात की पुष्टि भगवान अपने पूर्व जन्मों के वृत्तां से करते हैं। प्रत्येक कथा के अन्त में तथागत अपने पूर्व जन्म कथा का वर्तमान कथा से सामंजस्य स्थापित करते हैं अर्थात् स्पष्ट करते हैं कि आज के कौन-कौन से व्यक्ति किस-किस रूप में थे। जन्म :


जातक कथाओं का वास्तविक लेखक कौन है, यह कह सकना कटि है। ऐसा प्रतीत होता है कि भगवान बुद्ध के परिनिर्वाण के ५०० व के भीतर ये कथाएँ लिखी गई हैं। लेखक का उद्देश्य जन साधारण भगवान के उपदेशों का प्रचार करना है। भगवान बुद्ध के प्रति जनत की श्रद्धा का लाभ उठाने के उद्देश्य से उन्हीं के श्रीमुख से कथाओं क वर्णन कराया गया है। पुराणकारों ने भी देवताओं के नाम पर ग्रंथ की रचना की है। गोस्वामी तुलसीदास ने रामायण की कथा भगवान शंकर के मुख से कहलाई है।
* NOTIS - सूचना * 
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Description of the book In English :

Jataka means birth history. Mool Jataka contains 550 stories, each of which is related to his previous birth. There is repetition in some of these, that is, the same story has been told more than once. It was neither possible to give all the stories in this small booklet and it was not easy for me what to take and what to leave out of them. Still, I have dared to do this difficult task and I am presenting before the readers with the selected 25 stories. 

have kept the form of the stories according to the original but the language is my own. Each story is divided into three parts It is hard to say who is the real author of Jataka stories. These stories seem to have been written within 500 years of Lord Buddha's parinirvana. The purpose of the author is to propagate the teachings of the common God. 





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